भारत में बढ़ती Period poverty
स्वच्छ, आत्मनिर्भर, शिक्षित और विकसित भारत की बात तो सभी करते हैं, लेकिन स्वच्छता, आत्मनिर्भरता, शिक्षा और विकास के पथ पर कोई चलना नहीं चाहता। हमारे देश में महिलाएं प्राचीन काल से वर्तमान के आधुनिक काल तक चर्चा का विषय रही है। समाज में जब भी सुधारों की बात की जाती है तो महिलाओं के प्रति सुधार पहली प्राथमिकता के तौर पर सामने आता है। सती प्रथा से लेकर विधवा पुनर्विवाह तक, कर्मकांडो से लेकर शिक्षा तक, सभी क्षेत्रों में हम महिलाओं की समानता व हक के लिए आवाज उठाते हैं। लेकिन महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़े सभी पहलुओं को हम नजरअंदाज कर देते हैं। महिलाओं का अस्वस्थ होना आज विश्व की सबसे बड़ी समस्या है। पूरे विश्व में लगभग 62% ऐसी महिलाएं हैं जो अपने स्वास्थ्य के प्रति या तो जागरुक नहीं है, या ध्यान ही नहीं देती। पीरियड पाॅवर्टी एक ऐसा ही विषय है जिसे हमारा समाज लंबे अरसे से नजरअंदाज करता आ रहा है।
जब कम आय वाले लोग पीरियड प्रोडक्ट्स (जैसे टैम्पोन, सेनेटरी पैड) को नहीं खरीद पाते या उन तक अपनी पहुंच नहीं बना पाते तो इसे पीरियड पाॅवर्टी कहा जाता है। भारत में पीरियड पाॅवर्टी अपने सबसे ऊपरी स्तर पर पाई जाती है। संयुक्त राष्ट्र बाल कोष की रिपोर्ट की मानें तो वर्ष 2011 में केवल 13% ही ऐसी लड़कियां हैं जिन्हें पीरियड से पहले पीरियड के बारे में जानकारी है। साथ ही देश में 60% ऐसी लड़कियां हैं जिन्होंने पीरियड आने पर स्कूल छोड़ दिया। हमारे देश में पीरियड को गलत मानने और जागरूकता नहीं होने की वजह से 79% महिलाएं पीरियड टाइम में आत्मविश्वास खो देती है, वहीं 44% महिलाएं ऐसी हैं जिन्हें पीरियड टाइम में शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता है। महिलाओं के लिए जरूरी व आम बात होने के कारण भी हमारे समाज में फैली गलत धारणाओं की वजह से आज इस पर कोई बात करना नहीं चाहता। भारत में केवल पुदुचेरी तथा अंडमान निकोबार द्वीप समूह ही ऐसे क्षेत्र हैं जहां 99% महिलाएं पीरियड प्रोडक्ट का इस्तेमाल करती है व इसके प्रति जागरूक हैं।

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